बैठी ये जोंकें रिमझिम बरखा बरसने लगते ही बाहर निकलती हैं। मानवी गंध संघ्ूाते ही आनंदित होती हैं। ऊपर से वृक्षों, पत्तों से वे टप-टप कूद पड़ती है, नीचे पाॅंव पड़ते ही वे तलवे चाटने लगती हैं और मानवी शरीर की पिंडलियों, जांॅघों-जो भी हिस्सा मिले, उससे चिपककर सुप-सुप लहू सुड़कने लगती हैं। बड़े-बड़े बदमाश पाजी कंटक लोग जो कारागृह के कठोर-से-कठोर दंड से नहीं घबराते, वे जब जंगल
की कटाई के लिए जाते हैं तो इन जोंको के भय से कांॅपने
बैठी ये जोंकें रिमझिम बरखा बरसने लगते ही बाहर निकलती हैं। मानवी गंध संघ्ूाते ही आनंदित होती हैं। ऊपर से वृक्षों, पत्तों से वे टप-टप कूद पड़ती है, नीचे पाॅंव पड़ते ही वे तलवे चाटने लगती हैं और मानवी शरीर की पिंडलियों, जांॅघों-जो भी हिस्सा मिले, उससे चिपककर सुप-सुप लहू सुड़कने लगती हैं। बड़े-बड़े बदमाश पाजी कंटक लोग जो कारागृह के कठोर-से-कठोर दंड से नहीं घबराते, वे जब जंगल
की कटाई के लिए जाते हैं तो इन जोंको के भय से कांॅपने