लगते हैं। जंगल से काम करके बंदी जब शाम ढले वापस लौटते तब ऐसा लगता वे लहू में नहाकर आए हैं, क्यांेकि यहां-वहां सर्वत्र जोंकों के काटने से शरीर में छेद हो जाते और उन छेदों से लहू की पतली धारा निकलती रहती। अच्छा, ये जोंकें भी एक या दो नहीं, इधर मनुष्य अपने हाथों से मुट्ठी भर-भरकर उन्हें अपने शरीर से उखाड़कर फंेक रहा है और उघर छोटी-बड़ी जोंकों के झुंड ऊपर से कूदकर या नीचे से चढ़कर अथवा आजू-बाजू से आकर चिपकते जाते हैं।
इन जंगलों में भयंकर साॅंप की तरह के गिरगिटों का भी,
लगते हैं। जंगल से काम करके बंदी जब शाम ढले वापस लौटते तब ऐसा लगता वे लहू में नहाकर आए हैं, क्यांेकि यहां-वहां सर्वत्र जोंकों के काटने से शरीर में छेद हो जाते और उन छेदों से लहू की पतली धारा निकलती रहती। अच्छा, ये जोंकें भी एक या दो नहीं, इधर मनुष्य अपने हाथों से मुट्ठी भर-भरकर उन्हें अपने शरीर से उखाड़कर फंेक रहा है और उघर छोटी-बड़ी जोंकों के झुंड ऊपर से कूदकर या नीचे से चढ़कर अथवा आजू-बाजू से आकर चिपकते जाते हैं।
इन जंगलों में भयंकर साॅंप की तरह के गिरगिटों का भी,