रहा था। इतने में एक हवलदार ने-जिसे मेरे लिए ही नियुक्त किया गया था-बताया, ’’समय पूरा हो गया है, चलिए।’’ मैं सीढ़ियां चढ़ता ऊपर अपनी कोठरी में आ गया। परंतु जो विचार कर रहा था उसी में उलझाा होने से वैसे ही बैठा रहा। उस निमग्नता में काफी समय व्यतीत हुआ कि पुनः दरवाजा खड़का और हवलदार ने भीतर प्रवेश किया। उसके साथ एक बंदी था, जिसके सिर पर एक गठरी थी। सोचते-सोचते मेरा चित्त श्शांत हो गया और मैं पल भर के लिए उसी तरह आंखें खोले निश्चित बैठा रहा। इसे देख हवलदार ने कहा,
रहा था। इतने में एक हवलदार ने-जिसे मेरे लिए ही नियुक्त किया गया था-बताया, ’’समय पूरा हो गया है, चलिए।’’ मैं सीढ़ियां चढ़ता ऊपर अपनी कोठरी में आ गया। परंतु जो विचार कर रहा था उसी में उलझाा होने से वैसे ही बैठा रहा। उस निमग्नता में काफी समय व्यतीत हुआ कि पुनः दरवाजा खड़का और हवलदार ने भीतर प्रवेश किया। उसके साथ एक बंदी था, जिसके सिर पर एक गठरी थी। सोचते-सोचते मेरा चित्त श्शांत हो गया और मैं पल भर के लिए उसी तरह आंखें खोले निश्चित बैठा रहा। इसे देख हवलदार ने कहा,