जीवन स्वयं ही क पिश्टपेशण है। पंचमहाभतों को निचोड़, बटकर जीवन की यह रस्सी बटनी है, बार-बार तंतुओं को लंबा करते रहना और अंत में मृत्यु के मोगरे से कूटकर पुनः जटाएं बनाकर पंचमहाभूतों के ढेर में उन्हें मिला देना।
प्रातः के पश्चात् संध्या, संध्या के पश्चात् पुनः सवेरा-सभी पिश्टपेशण । वनस्पति खा-खाकर जीना, जीते जीते मर जाना, मरते ही उस अस्थि-मांस को वनस्पति खा जाए-सभी पिश्टपेशण। तेजामेधा की सूर्यमाला, सूर्यमाला की पृथ्वी,
जीवन स्वयं ही क पिश्टपेशण है। पंचमहाभतों को निचोड़, बटकर जीवन की यह रस्सी बटनी है, बार-बार तंतुओं को लंबा करते रहना और अंत में मृत्यु के मोगरे से कूटकर पुनः जटाएं बनाकर पंचमहाभूतों के ढेर में उन्हें मिला देना।
प्रातः के पश्चात् संध्या, संध्या के पश्चात् पुनः सवेरा-सभी पिश्टपेशण । वनस्पति खा-खाकर जीना, जीते जीते मर जाना, मरते ही उस अस्थि-मांस को वनस्पति खा जाए-सभी पिश्टपेशण। तेजामेधा की सूर्यमाला, सूर्यमाला की पृथ्वी,