गीता सरीखा दर्शन भी जिसमें अच्छी तरह व्यक्त हो सकता है, उपेक्षा करना हानिकारक, निर्दयता तथा मराठी भाषा के लिए लांछनास्पद है। मोरो पंत के अनुष्टुप् हैं और कुछ समर्थ रामदास के, बाकी उसे (अनुष्टुप् छंद को) कोई पूछता तक नहीं। अतः उसी में एक मंजुल, ललित, छोटी सी काव्य-रचना क्यों न की जाए। तब स्मरण करने लगा, इस वृत्त के नियम क्या हैं। कुछ स्मरण ही नहीं आ रहा था। साथ में वृत्त दर्पण भी नहीं था। अन्य अनुष्टुप् यथासंभव स्मरण करते,
गीता सरीखा दर्शन भी जिसमें अच्छी तरह व्यक्त हो सकता है, उपेक्षा करना हानिकारक, निर्दयता तथा मराठी भाषा के लिए लांछनास्पद है। मोरो पंत के अनुष्टुप् हैं और कुछ समर्थ रामदास के, बाकी उसे (अनुष्टुप् छंद को) कोई पूछता तक नहीं। अतः उसी में एक मंजुल, ललित, छोटी सी काव्य-रचना क्यों न की जाए। तब स्मरण करने लगा, इस वृत्त के नियम क्या हैं। कुछ स्मरण ही नहीं आ रहा था। साथ में वृत्त दर्पण भी नहीं था। अन्य अनुष्टुप् यथासंभव स्मरण करते,