उन्हें बोलकर और उनमें नियम ढूंढ़कर उनका मंथन करता रहा। सारा दिन इसी माथापच्ची में बीत गया। मात्राओं की गिनती करें तो किसी में अठारह, किसी में बीस तो किसी में पच्चीस। किसी का किसी से तालमेल नहीं। अच्छा, गणवृत्त कहा जाए तो गण भी कहां मेल खा रहे हैं? य गण देखा, भ गण देखा-गणों में तो उसकी गणना ही नहीं। इतने में झट से बचपन में रटा-रटाकर एक चरण स्मरण हुआ जिसने हाहाकार मचा दिया। ‘अनुष्टुप् छंद वह जिसका कोई नियम ही नहीं। ( अनुष्टुप्
उन्हें बोलकर और उनमें नियम ढूंढ़कर उनका मंथन करता रहा। सारा दिन इसी माथापच्ची में बीत गया। मात्राओं की गिनती करें तो किसी में अठारह, किसी में बीस तो किसी में पच्चीस। किसी का किसी से तालमेल नहीं। अच्छा, गणवृत्त कहा जाए तो गण भी कहां मेल खा रहे हैं? य गण देखा, भ गण देखा-गणों में तो उसकी गणना ही नहीं। इतने में झट से बचपन में रटा-रटाकर एक चरण स्मरण हुआ जिसने हाहाकार मचा दिया। ‘अनुष्टुप् छंद वह जिसका कोई नियम ही नहीं। ( अनुष्टुप्