छंद ते ज्याला एक नेम नसे गणीं)।’ ‘नियम ही नहीं’-ऐसे शास्त्र वचन से प्रभावित होने के कारण मात्र श्रुति सुख पर ही निर्भर रहकर मैंने अनुष्टुप् रचना का सपाटा लगाया।
तीन-चार दिनों के हमारे इस बलात्कार से क्षुब्ध होकर ही मानो वृत्तदर्पणांतर्गत इस तीसरे चरण ने क्रोध से ताव खाकर स्वयं को प्रकट किया, जैसे प्राचीन काल में निषादाविद्वांड दर्शन से प्रक्षुब्ध होकर आदिकवि के शोक ने श्लोक रूप धारण करके उस प्रथम अनुष्टुप् का उच्चारण
छंद ते ज्याला एक नेम नसे गणीं)।’ ‘नियम ही नहीं’-ऐसे शास्त्र वचन से प्रभावित होने के कारण मात्र श्रुति सुख पर ही निर्भर रहकर मैंने अनुष्टुप् रचना का सपाटा लगाया।
तीन-चार दिनों के हमारे इस बलात्कार से क्षुब्ध होकर ही मानो वृत्तदर्पणांतर्गत इस तीसरे चरण ने क्रोध से ताव खाकर स्वयं को प्रकट किया, जैसे प्राचीन काल में निषादाविद्वांड दर्शन से प्रक्षुब्ध होकर आदिकवि के शोक ने श्लोक रूप धारण करके उस प्रथम अनुष्टुप् का उच्चारण