(बंदियों में से जिन्हें अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जाता) लोगों की ‘चलो भाई, काम करो,’ ‘ऐ, साले, थोबड़े में क्या ठूसां हैं, जैसी चीख पुकार देखने लायक होती। इस सारे हंगामे में पल भर के लिए इस यथार्थ का विस्मरण होता कि मैं भी बंदीवान हूं। परंतु कब तक? तभी तक, जब तक मुंह में भरे हुए टुकड़े पेटी अफसर के देखने पर कमर पर धम्म से उसकी सोटी का धप्पा पड़ा नहीं अथवा उस भार के नीचे दोपहर तक अंग-अंग टूटकर भारी नहीं हो गया।
दही नारियल
(बंदियों में से जिन्हें अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जाता) लोगों की ‘चलो भाई, काम करो,’ ‘ऐ, साले, थोबड़े में क्या ठूसां हैं, जैसी चीख पुकार देखने लायक होती। इस सारे हंगामे में पल भर के लिए इस यथार्थ का विस्मरण होता कि मैं भी बंदीवान हूं। परंतु कब तक? तभी तक, जब तक मुंह में भरे हुए टुकड़े पेटी अफसर के देखने पर कमर पर धम्म से उसकी सोटी का धप्पा पड़ा नहीं अथवा उस भार के नीचे दोपहर तक अंग-अंग टूटकर भारी नहीं हो गया।
दही नारियल