मिलती थी। मझे पेंसिल का आधा इंच टुकड़ा पास रखना भी मना था। फिर स्टेड सरीखे बंदी की तरह उन विशयों पर लेख लिखने का नाम ही नहीं लेना चाहिए, जिन्हें अखबारों में निरूपद्रवी समझा जाता था। उस कोठरी में, जिसमें मुझे रखा गया था, पंछी तक पर नहीं मार सकता था, फिर प्रचार की बात ही क्या करना् ! कागज का टुकड़ा रखना भी जहां अपराध समझा जाता हो, वहां लेखन! क्लम घिसना सर्वथा असंभव ही था, स्वयं ही पठन द्वारा ज्ञान-प्राप्ति और भूली-बिसरी एकाध
मिलती थी। मझे पेंसिल का आधा इंच टुकड़ा पास रखना भी मना था। फिर स्टेड सरीखे बंदी की तरह उन विशयों पर लेख लिखने का नाम ही नहीं लेना चाहिए, जिन्हें अखबारों में निरूपद्रवी समझा जाता था। उस कोठरी में, जिसमें मुझे रखा गया था, पंछी तक पर नहीं मार सकता था, फिर प्रचार की बात ही क्या करना् ! कागज का टुकड़ा रखना भी जहां अपराध समझा जाता हो, वहां लेखन! क्लम घिसना सर्वथा असंभव ही था, स्वयं ही पठन द्वारा ज्ञान-प्राप्ति और भूली-बिसरी एकाध