पुस्तक कभी-कभार हाथ लग जाए तो मात्र पढ़कर संचित किया हुआ ज्ञान उस फलहीन वृक्ष अथवा जलाशय में जलसंग्रह की तरह ही व्यर्थ होगा, जिसके जल से हजारों तो क्या, एकाध प्यासे की तृश्णा का भी श्शमन नहीं होता, अथवा न ही अन्नोत्पादन से क्षुधा का श्शमन होता है। जिन्होंने महान् तथा उपयुक्त कार्य किये हैं, मेरे समान कारावास तो उनमें से किसी एक को भी नहीं भुगतना पड़ा। ऐसे इस कठोर साधनहीन बंदीवास में भला मैं कौन सा कार्य कर सकता हूं- यह विकट समस्या थी।
पुस्तक कभी-कभार हाथ लग जाए तो मात्र पढ़कर संचित किया हुआ ज्ञान उस फलहीन वृक्ष अथवा जलाशय में जलसंग्रह की तरह ही व्यर्थ होगा, जिसके जल से हजारों तो क्या, एकाध प्यासे की तृश्णा का भी श्शमन नहीं होता, अथवा न ही अन्नोत्पादन से क्षुधा का श्शमन होता है। जिन्होंने महान् तथा उपयुक्त कार्य किये हैं, मेरे समान कारावास तो उनमें से किसी एक को भी नहीं भुगतना पड़ा। ऐसे इस कठोर साधनहीन बंदीवास में भला मैं कौन सा कार्य कर सकता हूं- यह विकट समस्या थी।