हो गई। ऐसा प्रतीत हुआ कि निश्क्रिय विफलता के भय का बोझ हलका हो गया। आतुर मन ने यह गणना भी कर ली कि प्रतिदिन कम-से-कम दस से बीस कविताओं की रचना और पुराने हर संस्करण के साथ कंठस्थ करने का क्रम रखा जाए, तो एक या आधा लाख महाकाव्य की रचना करना संभव है। तो फिर शुभस्य श्शीघ्रम्- आज ही हो जाए श्रीगणेश। प्रथम श्री गुरूगोविन्दसिंह का चरित्र गान।
श्री गोविन्दसिंह का चरित्र
क्योंकि गोविंदसिंह हुतात्माओं के मुकुट मणि थे। महान्
हो गई। ऐसा प्रतीत हुआ कि निश्क्रिय विफलता के भय का बोझ हलका हो गया। आतुर मन ने यह गणना भी कर ली कि प्रतिदिन कम-से-कम दस से बीस कविताओं की रचना और पुराने हर संस्करण के साथ कंठस्थ करने का क्रम रखा जाए, तो एक या आधा लाख महाकाव्य की रचना करना संभव है। तो फिर शुभस्य श्शीघ्रम्- आज ही हो जाए श्रीगणेश। प्रथम श्री गुरूगोविन्दसिंह का चरित्र गान।
श्री गोविन्दसिंह का चरित्र
क्योंकि गोविंदसिंह हुतात्माओं के मुकुट मणि थे। महान्