यश से मंडित महापुरूश राजप्रासादों के सुवर्ण कलशों जैसे तेजस्वी दिखते ही हैं। परंतु आज उनका चरित्र
बखानने में, उनके यशोगान करने से मुझे उतनी श्शांति नहीं मिल सकती, उलटे मेरे सिर पड़ी असफलता की तीव्रता अधिक कश्टप्रद हो सकती है। आज मेरा ध्येय यशोमयी राजप्रासाद के पैरों तले गहराई में दबी अपयश की उस नींव का चिंतन करना है। इसीलिए आज मुझे गुरू गाविंदसिंहजी की असफलता की गाथा गानी है, ’चमकौर’ दुर्ग से पलायन करते समय जिनका संपूर्ण पराभव हो गया है,
यश से मंडित महापुरूश राजप्रासादों के सुवर्ण कलशों जैसे तेजस्वी दिखते ही हैं। परंतु आज उनका चरित्र
बखानने में, उनके यशोगान करने से मुझे उतनी श्शांति नहीं मिल सकती, उलटे मेरे सिर पड़ी असफलता की तीव्रता अधिक कश्टप्रद हो सकती है। आज मेरा ध्येय यशोमयी राजप्रासाद के पैरों तले गहराई में दबी अपयश की उस नींव का चिंतन करना है। इसीलिए आज मुझे गुरू गाविंदसिंहजी की असफलता की गाथा गानी है, ’चमकौर’ दुर्ग से पलायन करते समय जिनका संपूर्ण पराभव हो गया है,