मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

मेरा मन सुदूर दृश्य देखने में तल्लीन हो रहा था-और मेरे हाथ नारियल की मोटी-मोटी जटाएं तोड़ने, कूटने में, उन्हें सुलझाने में व्यस्त थे। प्रतिदिन के लिए निश्चित दस-पंद्रह आर्या (मराठी छंद) बन चुकी थाी-जटाएं सुलझाना भी समाप्त हो चुका। हाथ छिल गए थे, छाले पड़ गए थे, जिनसे लहू रिसने लगा था। इसबात का मुझे स्मरण नहीं कि हेग के निर्णय के पश्चात् डोंगरी के बंदीगृह में मैं कितने दिन पड़ा रहा। प्रातःकाल उठना, व्यायाम के लिए टहलते हुए मुखोद्गत योगसूत्रों का पाठ करना,


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मेरा मन सुदूर दृश्य देखने में तल्लीन हो रहा था-और मेरे हाथ नारियल की मोटी-मोटी जटाएं तोड़ने, कूटने में, उन्हें सुलझाने में व्यस्त थे। प्रतिदिन के लिए निश्चित दस-पंद्रह आर्या (मराठी छंद) बन चुकी थाी-जटाएं सुलझाना भी समाप्त हो चुका। हाथ छिल गए थे, छाले पड़ गए थे, जिनसे लहू रिसने लगा था। इसबात का मुझे स्मरण नहीं कि हेग के निर्णय के पश्चात् डोंगरी के बंदीगृह में मैं कितने दिन पड़ा रहा। प्रातःकाल उठना, व्यायाम के लिए टहलते हुए मुखोद्गत योगसूत्रों का पाठ करना,


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