दस बजे खुलता। इस नियम का मैं इतना अभ्यस्त हो चुका था कि कभी बीच में द्वार खुलने की प्रतीक्षा भी शेश नहीं रही।
प्रतीक्षा ही नहीं रहने से बंद द्वार देखकर वह अस्वस्थता जो पहले होती थी, बहुत कम होती जा रही थी। उस पर अचानक मुझे एक साधन मिल गया, जो आजकल काम करते समय प्रतीत होनेवाली उकताहट को दूर करता था। कोठरी की छत में एक दरार थी, उसमें एक कबूतर-परिवार ने खपरैल के नीचे अपना डेरा जमाया हुआ था। उसकी ओर देखते हुए मैं कठिन समय
दस बजे खुलता। इस नियम का मैं इतना अभ्यस्त हो चुका था कि कभी बीच में द्वार खुलने की प्रतीक्षा भी शेश नहीं रही।
प्रतीक्षा ही नहीं रहने से बंद द्वार देखकर वह अस्वस्थता जो पहले होती थी, बहुत कम होती जा रही थी। उस पर अचानक मुझे एक साधन मिल गया, जो आजकल काम करते समय प्रतीत होनेवाली उकताहट को दूर करता था। कोठरी की छत में एक दरार थी, उसमें एक कबूतर-परिवार ने खपरैल के नीचे अपना डेरा जमाया हुआ था। उसकी ओर देखते हुए मैं कठिन समय