नहीं जा सकता। परिस्थिति की परिधि में जो बताया जा सकता है, वह बिल्कुल ऊपरी सतह का, खोखला तथा अपेक्षाकृत श्रुद्र लगता हुआ, कहने में कोई रूचि नहीं और जो कहने लायक लगता है, उसे परिस्थितियां कहने नहीं देती। ऐसी अवस्था में कुछ भी बताते हुए कथ्य का चित्र रंगहीन तथा सत्वहीन कर देने की अपेक्षा अभी कुछ भी ने बताएं। जब वह दिन आ जाएगा कि सारी गूढ़ आकांक्षाएं अभिव्यक्ति हो सकें, सारी मूक भावनाएं खुलेआम बातें कर सके, उस दिन जो कुछ कहना है,
नहीं जा सकता। परिस्थिति की परिधि में जो बताया जा सकता है, वह बिल्कुल ऊपरी सतह का, खोखला तथा अपेक्षाकृत श्रुद्र लगता हुआ, कहने में कोई रूचि नहीं और जो कहने लायक लगता है, उसे परिस्थितियां कहने नहीं देती। ऐसी अवस्था में कुछ भी बताते हुए कथ्य का चित्र रंगहीन तथा सत्वहीन कर देने की अपेक्षा अभी कुछ भी ने बताएं। जब वह दिन आ जाएगा कि सारी गूढ़ आकांक्षाएं अभिव्यक्ति हो सकें, सारी मूक भावनाएं खुलेआम बातें कर सके, उस दिन जो कुछ कहना है,