चन्द्रकान्ता - Chandrakanta



तेजसिंह – (हँस कर) ‘तरकीब क्या, बस वही तिलिस्मी गुलाब का फूल घिस कर सभी को पिलाऊँगा और आप भी पीऊँगा, फिर सात दिन तक बेहोश करने वाला कौन है?’

कुमार – ‘हाँ ठीक है, पर वह वैद्य भी कैसा चतुर होगा जिसने दवाइयों से ऐसे काम के नायाब फूल बनाए।’

तेजसिंह – ‘ठीक ही है।’

इतने में वही औरत सामने से आती दिखाई पड़ी, उसके पीछे तीन लौंडियाँ आसन, पँचपात्र, जल इत्यादि हाथों में लिए आ रही थीं।

उस बाग में एक पेड़ के नीचे कई पत्थर बैठने लायक रखे हुए थे,


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तेजसिंह – (हँस कर) ‘तरकीब क्या, बस वही तिलिस्मी गुलाब का फूल घिस कर सभी को पिलाऊँगा और आप भी पीऊँगा, फिर सात दिन तक बेहोश करने वाला कौन है?’

कुमार – ‘हाँ ठीक है, पर वह वैद्य भी कैसा चतुर होगा जिसने दवाइयों से ऐसे काम के नायाब फूल बनाए।’

तेजसिंह – ‘ठीक ही है।’

इतने में वही औरत सामने से आती दिखाई पड़ी, उसके पीछे तीन लौंडियाँ आसन, पँचपात्र, जल इत्यादि हाथों में लिए आ रही थीं।

उस बाग में एक पेड़ के नीचे कई पत्थर बैठने लायक रखे हुए थे,


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