चन्द्रकान्ता - Chandrakanta

हो। वाह उस्ताद वाह। अब तो हम लोग उछलते-कूदते महल में चलेंगे और सभी को दोजख में पहुँचाएँगे, लाओ एक-एक गोला सभी को दे दो।’

आफत – ‘अभी क्यों, जब चलने लगेगे दे देंगे, कल का दिन जो काटना है।’

जालिम – ‘अच्छा, लेकिन उस्ताद, तुमने इतने दिन पीछे का इश्तिहार क्यों दिया? आज का ही दिन अगर मुकर्रर किया होता तो मजा हो जाता।’

आफत – ‘हमने समझा कि बद्रीनाथ जरा चालाक है, शायद जल्दी हाथ न लगे इसलिए ऐसा किया, मगर यह तो निरा बोदा निकला।’


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हो। वाह उस्ताद वाह। अब तो हम लोग उछलते-कूदते महल में चलेंगे और सभी को दोजख में पहुँचाएँगे, लाओ एक-एक गोला सभी को दे दो।’

आफत – ‘अभी क्यों, जब चलने लगेगे दे देंगे, कल का दिन जो काटना है।’

जालिम – ‘अच्छा, लेकिन उस्ताद, तुमने इतने दिन पीछे का इश्तिहार क्यों दिया? आज का ही दिन अगर मुकर्रर किया होता तो मजा हो जाता।’

आफत – ‘हमने समझा कि बद्रीनाथ जरा चालाक है, शायद जल्दी हाथ न लगे इसलिए ऐसा किया, मगर यह तो निरा बोदा निकला।’


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