चन्द्रकान्ता - Chandrakanta



जालिम – ‘अब क्या करना चाहिए?’

आफत – ‘इस वक्त तो कुछ नहीं, मगर कल बारह बजे रात को महल में चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।’

जालिम – ‘इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, अब तो हम और तुम साथ ही हैं, जब जो कहोगे, करेंगे।’

आफत – ‘अच्छा तो आज यहाँ से टल कर किसी दूसरी जगह आराम करना मुनासिब है। कल देखो खुदा क्या करता है। मैं तो कसम खा चुका हूँ कि महल में जा कर बिना सभी का काम तमाम किए एक दाना मुँह में नहीं डालूँगा।’

जालिम – ‘उस्ताद, ऐसा नहीं करना चाहिए, तुम कमजोर हो जाओगे।’


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जालिम – ‘अब क्या करना चाहिए?’

आफत – ‘इस वक्त तो कुछ नहीं, मगर कल बारह बजे रात को महल में चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।’

जालिम – ‘इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, अब तो हम और तुम साथ ही हैं, जब जो कहोगे, करेंगे।’

आफत – ‘अच्छा तो आज यहाँ से टल कर किसी दूसरी जगह आराम करना मुनासिब है। कल देखो खुदा क्या करता है। मैं तो कसम खा चुका हूँ कि महल में जा कर बिना सभी का काम तमाम किए एक दाना मुँह में नहीं डालूँगा।’

जालिम – ‘उस्ताद, ऐसा नहीं करना चाहिए, तुम कमजोर हो जाओगे।’


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