वनकन्या भी दिखाई न पड़ी, बल्कि यह भी मालूम न हुआ कि वे दोनों किस राह से आये थे और कब चले गये? जब तक वनकन्या और योगीजी यहां थे, उनके आने का रास्ता भी खुला हुआ था, दीवार में दरार मालूम पड़ती थी, ज़मीन फटी हुई दिखाई देती थी, मगर अब कहीं कुछ नहीं था।
चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : दूसरा बयान)
आखिर कुंवर वीरेन्द्रसिंह ने तेज़सिंह से कहा, ‘‘मुझे अभी तक यह न मालूम हुआ कि योगी जी ने उंगली के इशारे से तुम्हें क्या दिखलाया और इतनी देर तक तुम्हारा ध्यान कहां अटका रहा,
वनकन्या भी दिखाई न पड़ी, बल्कि यह भी मालूम न हुआ कि वे दोनों किस राह से आये थे और कब चले गये? जब तक वनकन्या और योगीजी यहां थे, उनके आने का रास्ता भी खुला हुआ था, दीवार में दरार मालूम पड़ती थी, ज़मीन फटी हुई दिखाई देती थी, मगर अब कहीं कुछ नहीं था।
चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : दूसरा बयान)
आखिर कुंवर वीरेन्द्रसिंह ने तेज़सिंह से कहा, ‘‘मुझे अभी तक यह न मालूम हुआ कि योगी जी ने उंगली के इशारे से तुम्हें क्या दिखलाया और इतनी देर तक तुम्हारा ध्यान कहां अटका रहा,