राजा सुरेन्द्रसिंह ने महाराज शिवदत्त से कहा, ‘‘अच्छा अब मैं विदा होता हूं। पहरा अभी उठाता हूं। रात को जब जी चाहे चले जाना मगर आओ गले तो मिल लें।’’
शिव : (हाथ जोड़कर) नहीं, मैं इस लायक नहीं रहा कि आपसे गले मिलूं।
‘‘नहीं, ज़रूर ऐसा करना होगा!’’ कहकर सुरेन्द्रसिंह ने शिवदत्त को जबरदस्ती गले लगा लिया और उदास मुख से विदा हो अपने महल की तरफ रवाना हुए। मकान के चारों तरफ से पहरा उठाते गये।
जीतसिंह, बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण
राजा सुरेन्द्रसिंह ने महाराज शिवदत्त से कहा, ‘‘अच्छा अब मैं विदा होता हूं। पहरा अभी उठाता हूं। रात को जब जी चाहे चले जाना मगर आओ गले तो मिल लें।’’
शिव : (हाथ जोड़कर) नहीं, मैं इस लायक नहीं रहा कि आपसे गले मिलूं।
‘‘नहीं, ज़रूर ऐसा करना होगा!’’ कहकर सुरेन्द्रसिंह ने शिवदत्त को जबरदस्ती गले लगा लिया और उदास मुख से विदा हो अपने महल की तरफ रवाना हुए। मकान के चारों तरफ से पहरा उठाते गये।
जीतसिंह, बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण