चन्द्रकान्ता - Chandrakanta

और चुन्नीलाल को साथ लिये राजा सुरेन्द्रसिंह अपने दीवान खाने में जाकर बैठे। घण्टों महाराज शिवदत्त के बारे में अफसोस भरी बातचीत होती रही। मौका पाकर जीतसिंह ने अर्ज़ किया, ‘‘अब तो हमारे दरबार में और चार ऐयार हो गये हैं जिसकी बहुत ही खुशी है। अगर ताबेदार को पन्द्रह दिन की छुट्टी मिल जाती तो अच्छी बात थी, यहां से दूर बिरादरी में कुछ काम है, जाना ज़रूरी है।’’

सुरेन्द्र : इधर एक-एक दो-दो रोज़ की कई दफे तुम छुट्टी ले चुके हो।


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और चुन्नीलाल को साथ लिये राजा सुरेन्द्रसिंह अपने दीवान खाने में जाकर बैठे। घण्टों महाराज शिवदत्त के बारे में अफसोस भरी बातचीत होती रही। मौका पाकर जीतसिंह ने अर्ज़ किया, ‘‘अब तो हमारे दरबार में और चार ऐयार हो गये हैं जिसकी बहुत ही खुशी है। अगर ताबेदार को पन्द्रह दिन की छुट्टी मिल जाती तो अच्छी बात थी, यहां से दूर बिरादरी में कुछ काम है, जाना ज़रूरी है।’’

सुरेन्द्र : इधर एक-एक दो-दो रोज़ की कई दफे तुम छुट्टी ले चुके हो।


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