यह कह तेज़सिंह कुंवर वीरेन्द्रसिंह को उसी पहाड़ी के नीचे ले गये जहां से पानी का चश्मा शुरू होता था। उस चश्में में उतर चालीस हाथ नाप कर कुछ ज़मीन खोदी।
कुमार से तेज़सिंह ने कहा था कि , ‘‘इस छोटे तिलिस्म के तोड़ने और खज़ाना पाने की युक्ति किसी धातु के पत्र पर खुदी हुई यहीं ज़मीन में गड़ी है, मगर इस वक़्त यहां खोदने से उसका कुछ पता न लगा, हां एक चिट्ठी उसमें से जरूर मिली जिसको कुमार ने निकालकर पढ़ा यह लिखा था–’’
अब क्या खोदते हो! मतलब की कोई चीज़ नहीं है जो था,
यह कह तेज़सिंह कुंवर वीरेन्द्रसिंह को उसी पहाड़ी के नीचे ले गये जहां से पानी का चश्मा शुरू होता था। उस चश्में में उतर चालीस हाथ नाप कर कुछ ज़मीन खोदी।
कुमार से तेज़सिंह ने कहा था कि , ‘‘इस छोटे तिलिस्म के तोड़ने और खज़ाना पाने की युक्ति किसी धातु के पत्र पर खुदी हुई यहीं ज़मीन में गड़ी है, मगर इस वक़्त यहां खोदने से उसका कुछ पता न लगा, हां एक चिट्ठी उसमें से जरूर मिली जिसको कुमार ने निकालकर पढ़ा यह लिखा था–’’
अब क्या खोदते हो! मतलब की कोई चीज़ नहीं है जो था,