यहां तक कि चारों आदमी खड़े होकर चलने लगे मगर टटोलते हुए, क्योंकि बिलकुल अंधेरा था, हाथ तक नहीं दिखाई देता था। चलते-चलते कुंवर वीरेन्द्रसिंह का हाथ एक बन्द दरवाज़े पर लगा जो धक्का देने से खुल गया और भीतर बाखूबी रोशनी मालूम होने लगी।
चारों आदमी अन्दर गये, छोटा-सा बाग देखा जो चारों तरफ से साफ कहीं तिनके तक का नाम-निशान नहीं मालूम होता था, अभी कोई झाड़ू देकर गया है। इस बाग में कोई इमारत न थी, सिर्फ एक फौवारा बीच में था, मगर यह नहीं मालूम होता था कि इसका हौज़ कहां है।
यहां तक कि चारों आदमी खड़े होकर चलने लगे मगर टटोलते हुए, क्योंकि बिलकुल अंधेरा था, हाथ तक नहीं दिखाई देता था। चलते-चलते कुंवर वीरेन्द्रसिंह का हाथ एक बन्द दरवाज़े पर लगा जो धक्का देने से खुल गया और भीतर बाखूबी रोशनी मालूम होने लगी।
चारों आदमी अन्दर गये, छोटा-सा बाग देखा जो चारों तरफ से साफ कहीं तिनके तक का नाम-निशान नहीं मालूम होता था, अभी कोई झाड़ू देकर गया है। इस बाग में कोई इमारत न थी, सिर्फ एक फौवारा बीच में था, मगर यह नहीं मालूम होता था कि इसका हौज़ कहां है।