लम्बे चौड़े मैदान के सिवाय और कुछ नज़र न आया। तेज़सिंह ने चाहा कि घूमकर इस मैदान का हाल मालूम करें, मगर कई सबबों से वे ऐसा न कर सके। एक तो धूप कड़ी थी दूसरे कुमार ने घूमने की राय न दी और कहा, ‘‘ फिर जब मौका होगा इसके देख लेंगे। इस वक़्त तीसरी व चौथी खिड़की में चलकर देखने चाहिए क्या है?’’
चारों आदमी लौट आये और तीसरी खिड़की में घुसे। एक बाग में पहुंचते ही देखा कि वनकन्या कई सखियों को लिये घूम रही है लेकिन कुँवर वीरेन्द्रसिंह
लम्बे चौड़े मैदान के सिवाय और कुछ नज़र न आया। तेज़सिंह ने चाहा कि घूमकर इस मैदान का हाल मालूम करें, मगर कई सबबों से वे ऐसा न कर सके। एक तो धूप कड़ी थी दूसरे कुमार ने घूमने की राय न दी और कहा, ‘‘ फिर जब मौका होगा इसके देख लेंगे। इस वक़्त तीसरी व चौथी खिड़की में चलकर देखने चाहिए क्या है?’’
चारों आदमी लौट आये और तीसरी खिड़की में घुसे। एक बाग में पहुंचते ही देखा कि वनकन्या कई सखियों को लिये घूम रही है लेकिन कुँवर वीरेन्द्रसिंह